Halaman

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वानस्पतिक नाम : Phoenix dactylifera Linn. (पांपनिक्स डैक्टाइलीफेरा) Syn-Palma dactylifera (Linn.) Mill.
कुल : Arecaceae (ऐरिकेसी)
अंग्रेज़ी नाम : Date palm (डेट पॉम)

संस्कृत-पिण्डखर्जूरिका, स्वादुपिण्ड, पिण्डीफल, पिण्डखर्जूर, खर्जुर; हिन्दी-पिंडखजूर, छुहारा, छोहारा; उड़िया-खोरज्जुरी (Khorjjuri); उर्दू-खुर्मा (Khurma); कन्नड़-इचुलु (Ichulu), क्रीरइंचुली (Kririnchuli); गुजराती-खारेक (Kharek), खजूर (Khajur); तेलुगु-खजूरपुण्डु (Khajurpundu), खर्जूरामु (khajurramu); तमिल-पेरिच्चान्काय (Perichchankay), कर्चुरम (Karchuram); बंगाली-सोहारा (Sohara), खेजूर (Khejur); पंजाबी-खाजी (Khaji) मराठी-खारीक (Kharik), खजूर (Khajur); मलयालम-इट्टाप्पाम (Ittappaam), तेनित्त (Tenitta)।
अंग्रेजी-पर्सियन डेट (Persian date), ऐडिबिल डेट (Edible date), लार्ज डेट (Large date); अरबी-तमर (Tamar), नाखलेह (Nakhleh); फारसी-खुर्मा (Khurma), खुर्मा खुष्क (Khurma khushk)।
परिचय
यह भारत के शुष्क मुख्यतया राजस्थान, गुजरात तथा पंजाब में पाया जाता है। इसका लगभग 10-15 मी ऊँचा, एकलिंगाश्रयी वृक्ष होता है,
आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव  
खर्जूर मधुर, शीत, गुरु, स्निग्ध, वातपित्त शामक, रुचिकारक, हृद्य, तर्पण, विष्टम्भी, शुक्रल, बलकारक, दीपन, बृंहण, वृष्य, पुष्टिकारक तथा श्रमहर होता है।
यह ज्वर, अतिसार, क्षत, तृष्णा, कास, श्वास, मद, मूर्च्छा, कोष्ठगतवात, छर्दि, क्षय, रक्तपित्त, मदात्यय तथा दाहनाशक होता है।
खजूर फल मज्जा शीत, वृष्य तथा पित्तशामक होता है।
अपक्व खर्जुर त्रिदोषप्रकोपक होता है। पक्व खर्जुर हितकारी तथा त्रिदोषशामक होता है।
औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं विधि
  1. शिरशूल-खर्जूर के बीजों को पीसकर मस्तक पर लेप करने से अर्धावभेदकजन्य शिरशूल का शमन होता है।
  2. नेत्राभिष्यंद-खर्जूर बीजों को पीसकर आंखों के चारो ओर लगाने से नेत्राभिष्यंद तथा नेत्रशोथ का शमन होता है।
  3. खर्जूर फलों का क्वाथ बनाकर गरारा करने से मसूड़ों तथा दंत विकारों का शमन होता है।
  4. श्वास दौर्गन्ध्य-खर्जूर के 1-2 फलों को नित्य सेवन करने से श्वास दौर्गन्ध्य का शमन होता है।
  5. प्रतिश्याय (सर्दी/ जुकाम)-खजूर के 5-10 फलों  को 100 मिली दूध में पकाकर पीने से प्रतिश्याय का शमन होता है।
  6. सूखी खांसी-5-10 छुहारे, 1 ग्राम शतावरी चूर्ण तथा मिश्री को मिलाकर दूध में पकाकर पिलाने से सूखी खांसी मिटती है।
  7. श्वास-2 ग्राम छुहारे के चूर्ण में 500 मिग्रा सोंठ चूर्ण मिलाकर पान में रखकर खाने से श्वास रोग में लाभ होता है।
  8. शुष्क कास-समभाग छुहारे तथा शतावर को दूध में पकाकर, छानकर रख लें। 100-200 मिली दूध में मिश्री मिलाकर, पिलाने से शुष्क कास में लाभ होता है।
  9. अतिसार-10-15 ग्राम छुहारा चूर्ण को 100 मिली दूध में पकाकर सेवन करने से अतिसार का शमन होता है।
  10. तृष्णा (प्यास)-छुहारे की गुठली को पानी में घिसकर पिलाने से तृष्णा का शमन होता है।
  11. तृष्णा-50 ग्राम छुहारे के फलों के बीज निकालकर, उसमें 20 ग्राम मुनक्का, 5 ग्राम मुलेठी तथा 20 ग्राम खांड़, पिप्पली 5 ग्राम, दालचीनी 2 ग्राम, इलायची 1 ग्राम तथा तेजपात 5 ग्राम मिलाकर पीसकर शहद मिलाकर 1-1 ग्राम की गोलियां बनाकर, प्रात सायं 1-1 गोली चूसने से दाह, तृष्णा तथा रक्तपित्त में लाभ होता है।
  12. अरुचि-छुहारों को नीबू के रस में भिगोकर उसमें नमक तथा जीरा आदि मसाले मिलाकर, उसका अचार बनाकर 1 या 2 छुहारां का सेवन करने से अरुचि में लाभ होता है।
  13. पाण्डु-12 ग्राम सनाय, 200 ग्राम छुहारा तथा 3 ग्राम मंजिष्ठा के चूर्ण को रात्रि पर्यन्त जल में भिगोकर, प्रातकाल छानकर सेवन करने से पाण्डु (रक्त की कमी), पित्तविकार, रक्तविकार, खुजली तथा ज्वर का शमन होता है।
  14. प्रमेह-समभाग खर्जूर फल, सोंठ तथा गोक्षुर के सूक्ष्म चूर्ण में आधा भाग मिश्री मिलाकर, 5-6 ग्राम मात्रा में लेकर  उसमें घी मिलाकर प्रतिदिन प्रातकाल सेवन करने से प्रमेह में लाभ होता है।
  15. मूत्रकृच्छ्र-खर्जूर के रस में मिश्री मिलाकर पीने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।
  16. उपदंश-12-12 ग्राम  खर्जूर तथा सनाय में, 6 ग्राम मृद्दार शृंग चूर्ण मिलाकर, 5-6 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन प्रातकाल शीतल जल के साथ लेने से उपदंश में लाभ होता है।
  17. ऊरुस्भं-छुहारे के बीज रहित फलों के साथ बांबी की मिट्टी तथा सरसों को पीसकर शहद मिलाकर लेप करने से उरुस्तम्भ में लाभ होता है।
  18. नाड़ीव्रण-छुहारा भस्म को घी में मिलाकर व्रण पर लगाने से नाड़ीव्रण शीघ्र भर जाता है।
  19. व्रण-छुआरा बीज को पीसकर लेप करने से शोथ तथा व्रण में लाभ होता है।
  20. मदात्यय-10-20 मिली खर्जुरादिमन्थ का सेवन करने से मदात्यय में लाभ होता है।
  21. रक्तपित्त-छुहारे के चूर्ण में पुराना शहद मिलाकर, अवलेह बनाकर 5 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से रक्तपित्त में लाभ होता है तथा शरीर का पोषण होता है।
  22. रक्तपित्त-2-8 ग्राम फल चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर खिलाने से रक्तपित्त में लाभ होता है।
  23. दौर्बल्य-खर्जूर के 2-5 फलों को दूध में पकाकर, दूध को ठण्डा करके सेवन करने से या खर्जूर के 5-10 फलों का नित्य सेवन करके ऊपर से 1 गिलास दूध पीने से शरीर पुष्ट होता है तथा दुर्बलता का शमन होता है।
  24. 8-10 खर्जूर फलों के साथ 1 ग्राम सोंठ तथा 5-10 ग्राम मुनक्का मिलाकर दूध में पकाकर पिलाने से ज्वर जन्य दौर्बल्य का शमन होता है।
  25. दाह-4-10 छुहारों को पानी में भिगोकर, मसल-छानकर पिलाने से सर्वाङ्ग दाह का शमन होता है।
  26. वाजीकरणार्थ-दूध में फूलाए हुए खर्जूर फल की गुठली निकालकर उसमें तालमखाने के बीज भरकर, गेहूँ के आटे से लपेट कर, घी में पकाकर फिर चार गुने मधु में डुबाकर, चूल्हे के गर्त में 21 दिन तक के लिए दबाकर, फिर निकाल कर प्रतिदिन 1-1 फल को दूध के साथ सेवन करने से शरीर पुष्ट होता है।
प्रयोज्याङ्ग : पत्र, पुष्प, फल, बीज एवं मूल।
मात्रा : फल चूर्ण 2-8 ग्राम या चिकित्सक के परामर्शानुसार।

Dates: सेहत के लिए कमाल का है खर्जूर

वानस्पतिक नाम : Phoenix dactylifera Linn. (पांपनिक्स डैक्टाइलीफेरा) Syn-Palma dactylifera (Linn.) Mill.
कुल : Arecaceae (ऐरिकेसी)
अंग्रेज़ी नाम : Date palm (डेट पॉम)

संस्कृत-पिण्डखर्जूरिका, स्वादुपिण्ड, पिण्डीफल, पिण्डखर्जूर, खर्जुर; हिन्दी-पिंडखजूर, छुहारा, छोहारा; उड़िया-खोरज्जुरी (Khorjjuri); उर्दू-खुर्मा (Khurma); कन्नड़-इचुलु (Ichulu), क्रीरइंचुली (Kririnchuli); गुजराती-खारेक (Kharek), खजूर (Khajur); तेलुगु-खजूरपुण्डु (Khajurpundu), खर्जूरामु (khajurramu); तमिल-पेरिच्चान्काय (Perichchankay), कर्चुरम (Karchuram); बंगाली-सोहारा (Sohara), खेजूर (Khejur); पंजाबी-खाजी (Khaji) मराठी-खारीक (Kharik), खजूर (Khajur); मलयालम-इट्टाप्पाम (Ittappaam), तेनित्त (Tenitta)।
अंग्रेजी-पर्सियन डेट (Persian date), ऐडिबिल डेट (Edible date), लार्ज डेट (Large date); अरबी-तमर (Tamar), नाखलेह (Nakhleh); फारसी-खुर्मा (Khurma), खुर्मा खुष्क (Khurma khushk)।
परिचय
यह भारत के शुष्क मुख्यतया राजस्थान, गुजरात तथा पंजाब में पाया जाता है। इसका लगभग 10-15 मी ऊँचा, एकलिंगाश्रयी वृक्ष होता है,
आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव  
खर्जूर मधुर, शीत, गुरु, स्निग्ध, वातपित्त शामक, रुचिकारक, हृद्य, तर्पण, विष्टम्भी, शुक्रल, बलकारक, दीपन, बृंहण, वृष्य, पुष्टिकारक तथा श्रमहर होता है।
यह ज्वर, अतिसार, क्षत, तृष्णा, कास, श्वास, मद, मूर्च्छा, कोष्ठगतवात, छर्दि, क्षय, रक्तपित्त, मदात्यय तथा दाहनाशक होता है।
खजूर फल मज्जा शीत, वृष्य तथा पित्तशामक होता है।
अपक्व खर्जुर त्रिदोषप्रकोपक होता है। पक्व खर्जुर हितकारी तथा त्रिदोषशामक होता है।
औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं विधि
  1. शिरशूल-खर्जूर के बीजों को पीसकर मस्तक पर लेप करने से अर्धावभेदकजन्य शिरशूल का शमन होता है।
  2. नेत्राभिष्यंद-खर्जूर बीजों को पीसकर आंखों के चारो ओर लगाने से नेत्राभिष्यंद तथा नेत्रशोथ का शमन होता है।
  3. खर्जूर फलों का क्वाथ बनाकर गरारा करने से मसूड़ों तथा दंत विकारों का शमन होता है।
  4. श्वास दौर्गन्ध्य-खर्जूर के 1-2 फलों को नित्य सेवन करने से श्वास दौर्गन्ध्य का शमन होता है।
  5. प्रतिश्याय (सर्दी/ जुकाम)-खजूर के 5-10 फलों  को 100 मिली दूध में पकाकर पीने से प्रतिश्याय का शमन होता है।
  6. सूखी खांसी-5-10 छुहारे, 1 ग्राम शतावरी चूर्ण तथा मिश्री को मिलाकर दूध में पकाकर पिलाने से सूखी खांसी मिटती है।
  7. श्वास-2 ग्राम छुहारे के चूर्ण में 500 मिग्रा सोंठ चूर्ण मिलाकर पान में रखकर खाने से श्वास रोग में लाभ होता है।
  8. शुष्क कास-समभाग छुहारे तथा शतावर को दूध में पकाकर, छानकर रख लें। 100-200 मिली दूध में मिश्री मिलाकर, पिलाने से शुष्क कास में लाभ होता है।
  9. अतिसार-10-15 ग्राम छुहारा चूर्ण को 100 मिली दूध में पकाकर सेवन करने से अतिसार का शमन होता है।
  10. तृष्णा (प्यास)-छुहारे की गुठली को पानी में घिसकर पिलाने से तृष्णा का शमन होता है।
  11. तृष्णा-50 ग्राम छुहारे के फलों के बीज निकालकर, उसमें 20 ग्राम मुनक्का, 5 ग्राम मुलेठी तथा 20 ग्राम खांड़, पिप्पली 5 ग्राम, दालचीनी 2 ग्राम, इलायची 1 ग्राम तथा तेजपात 5 ग्राम मिलाकर पीसकर शहद मिलाकर 1-1 ग्राम की गोलियां बनाकर, प्रात सायं 1-1 गोली चूसने से दाह, तृष्णा तथा रक्तपित्त में लाभ होता है।
  12. अरुचि-छुहारों को नीबू के रस में भिगोकर उसमें नमक तथा जीरा आदि मसाले मिलाकर, उसका अचार बनाकर 1 या 2 छुहारां का सेवन करने से अरुचि में लाभ होता है।
  13. पाण्डु-12 ग्राम सनाय, 200 ग्राम छुहारा तथा 3 ग्राम मंजिष्ठा के चूर्ण को रात्रि पर्यन्त जल में भिगोकर, प्रातकाल छानकर सेवन करने से पाण्डु (रक्त की कमी), पित्तविकार, रक्तविकार, खुजली तथा ज्वर का शमन होता है।
  14. प्रमेह-समभाग खर्जूर फल, सोंठ तथा गोक्षुर के सूक्ष्म चूर्ण में आधा भाग मिश्री मिलाकर, 5-6 ग्राम मात्रा में लेकर  उसमें घी मिलाकर प्रतिदिन प्रातकाल सेवन करने से प्रमेह में लाभ होता है।
  15. मूत्रकृच्छ्र-खर्जूर के रस में मिश्री मिलाकर पीने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।
  16. उपदंश-12-12 ग्राम  खर्जूर तथा सनाय में, 6 ग्राम मृद्दार शृंग चूर्ण मिलाकर, 5-6 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन प्रातकाल शीतल जल के साथ लेने से उपदंश में लाभ होता है।
  17. ऊरुस्भं-छुहारे के बीज रहित फलों के साथ बांबी की मिट्टी तथा सरसों को पीसकर शहद मिलाकर लेप करने से उरुस्तम्भ में लाभ होता है।
  18. नाड़ीव्रण-छुहारा भस्म को घी में मिलाकर व्रण पर लगाने से नाड़ीव्रण शीघ्र भर जाता है।
  19. व्रण-छुआरा बीज को पीसकर लेप करने से शोथ तथा व्रण में लाभ होता है।
  20. मदात्यय-10-20 मिली खर्जुरादिमन्थ का सेवन करने से मदात्यय में लाभ होता है।
  21. रक्तपित्त-छुहारे के चूर्ण में पुराना शहद मिलाकर, अवलेह बनाकर 5 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से रक्तपित्त में लाभ होता है तथा शरीर का पोषण होता है।
  22. रक्तपित्त-2-8 ग्राम फल चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर खिलाने से रक्तपित्त में लाभ होता है।
  23. दौर्बल्य-खर्जूर के 2-5 फलों को दूध में पकाकर, दूध को ठण्डा करके सेवन करने से या खर्जूर के 5-10 फलों का नित्य सेवन करके ऊपर से 1 गिलास दूध पीने से शरीर पुष्ट होता है तथा दुर्बलता का शमन होता है।
  24. 8-10 खर्जूर फलों के साथ 1 ग्राम सोंठ तथा 5-10 ग्राम मुनक्का मिलाकर दूध में पकाकर पिलाने से ज्वर जन्य दौर्बल्य का शमन होता है।
  25. दाह-4-10 छुहारों को पानी में भिगोकर, मसल-छानकर पिलाने से सर्वाङ्ग दाह का शमन होता है।
  26. वाजीकरणार्थ-दूध में फूलाए हुए खर्जूर फल की गुठली निकालकर उसमें तालमखाने के बीज भरकर, गेहूँ के आटे से लपेट कर, घी में पकाकर फिर चार गुने मधु में डुबाकर, चूल्हे के गर्त में 21 दिन तक के लिए दबाकर, फिर निकाल कर प्रतिदिन 1-1 फल को दूध के साथ सेवन करने से शरीर पुष्ट होता है।
प्रयोज्याङ्ग : पत्र, पुष्प, फल, बीज एवं मूल।
मात्रा : फल चूर्ण 2-8 ग्राम या चिकित्सक के परामर्शानुसार।

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